Description
सोचना होगा कि पिछले 76 वर्षों से केवल अधिकारों की राजनीति करके हमने अपने ही देश की जड़ें खोखली करने में कितना सहयोग दिया… दिन में, महीने में… कितनी बार अपने से आगे राष्ट्र शब्द पर विचार किया… जिस राष्ट्र से हम अपने सारे अधिकार पाते हैं, उस राष्ट्र के लिए कर्तव्य निभाने/कर्म करने कोई अन्य बाहर से आएगा? या हमारा संविधान हमें केवल अधिकारों की सौगात देता है… कर्तव्य नहीं बताता…?
ब्रह्मचारी विश्वनाथ शास्त्री (सांसद) ने एक बार कहा था, “देश से व्यक्ति का रिश्ता क्या है ? जानना है तो जीवन में कभी काला पानी जाकर देखो, जहां गोरों ने हमारे देश के क्रांतिकारियों को ले जाकर रखा… यातनाएं दीं… ऊँची-ऊँची स्याह दीवारों की जेलें, जहाँ सूरज भी डर-डरकर रोशनी देता था… जहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता था… वे लोग अपनों से, सपनों से कितनी दूर थे, जिनसे सपनों में भी भूले से नहीं मिल सकते… जिस पर गोरों की क्रूर यातनाएं… वहाँ की दीवारों पर उनका लिखा हुआ बहुत कुछ है, जो आज भी सुरक्षित है… कभी वहां जाओ… उन क्रांतिकारियों के मन को पढ़ो, उन्हें अपनी जिन्दगी से क्या नाराजगी थी ? फिर अपने से पूछो कि क्या तुम उस हिंदुस्तान के लोग हो ? जिस मातृभूमि को आजाद कराने के लिए वे तिल-तिलकर हर सांस मरे…।
– इसी पुस्तक से











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