Description
भारतीय भाषाएं : उत्कर्ष और संवाद
वर्तमान काल भारतीय भाषाओं के उत्कर्ष और संवाद का काल है। भारत वर्ष संस्कृतियों, परंपराओं और भाषाओं का अनोखा गुलदस्ता है। हिमालय- कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ (गुजरात) से असम-अरुणाचल तक अनेकानेक विविध भाषाओं और उनके माध्यम से संचार संवाद की अनूठी परंपरा और उसका वर्तमान भारतीय भाषाओं और संस्कृति की सामासिकता का आधार और अनुष्ठान है।
भाषाई विविधता के इस भारतीय सामर्थ्य का शोधपरक आत्मनिरीक्षण और विवेचन मैसूरु स्थित डी. पाल कालेज एवं केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा (शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार) तथा दक्षिण हिंदी प्रचार सभा, मद्रास द्वारा संचालित पुष्पा हिंदी विद्यालय, मैसूरु (कर्नाटक) द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का मुख्य लक्ष्य है।
अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘नई सदी का साहित्यः हिंदी कन्नड़ का विशेष’ संदर्भ के अवसर पर प्रकाशित प्रस्तुत पुस्तक ‘हिंदी और कन्नड़ का तुलनात्मक साहित्य’ वस्तुतः इस पुस्तक की सामयिक उपयोगिता की परिचायक है। देश की समृद्ध सांस्कृतिक एकसूत्रता की आधार भाषाओं हिंदी और कन्नड़ के बीच परस्पर संचार और संवाद वर्तमान समय की एक बड़ी तथा राष्ट्रीयता के संपोषण की दृष्टि से एक महती आवश्यकता है। इस दृष्टि से हिंदी और कन्नड़ के शोधार्थियों, सुधी विद्वानों तथा छात्र-छात्राओं द्वारा प्रस्तुत विवेचनात्मक अंतर्वस्तु पुस्तक की विशिष्टता है।
पुस्तक की संपादक डॉ. ममता सत्यनारायण तथा डॉ. पुष्पा की उल्लेखनीय संपादकीय दृष्टि और विवेक का परिचायक यह संग्रह कन्नड़ साहित्य के चार-पांच सौ साल के अवदान और साथ ही हिंदी के संपर्क भाषा के रूप में सामर्थ्य एवं ऐतिहासिक अवदान का प्रामाणिक दस्तावेज बन सका है। अंग्रेजी के प्रभाव के बावजूद मौलिकता का सातत्य कन्नड़ साहित्य की विशिष्टता है। स्वाधीनता संग्राम में कन्नड़ तथा हिंदी साहित्य के ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित करती पुस्तक की अंतर्वस्तु इस विषय पर अभिनव दृष्टि प्रदान करती है। हिंदी, कन्नड़ के प्रगाढ़ संबंधों को शब्दाकृति प्रदान करती, पुस्तक में समाहित सामग्री, कबीर-बसवेश्वर – तुलसी (रामचरित मानस) प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त जैसे विश्वविश्रुत रचनाकारों की रचनाओं और उनके अनुवाद के माध्यम से हिंदी-कन्नड़ के पारस्परिक ऐतिहासिक संबंधों तथा अवदान की प्रमाणिकता को सुपुष्ट करती है। भारतीय साहित्य और संस्कृति के संपोषण और उन्नयन में हिंदी तथा कन्नड़ भाषा के पारस्परिक संबंधों और भूमिका की दृष्टि से प्रस्तुत पुस्तक एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में छात्र-छात्राओं, शिक्षकों, शोधार्थियों तथा साहित्य मनीषियों के लिए उपयोगी एवं लोकप्रिय सिद्ध होगी, ऐसी आशा है। दोनों भाषाओं के साहित्यिक सेतु के स्तंभ के रूप में पुस्तक की उपयोगिता सार्वकालिक महत्व की है।
सुधी पाठकों के लिए प्रस्तुत पुस्तक का महत्व एक विरासत साहित्य सामग्री के रूप में सिद्ध हो, इसी शुभकामना के साथ ‘भवतु सब्ब मंगलम्…’
– प्रो. राममोहन पाठक काशी












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