शिवाजी कौन थे?

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साहित्य की ऐसी शायद ही कोई विधा बची हो जिसमें शिवाजी के चरित्र पर कोई रचना न रची गयी हो। सिनेमा, रंगमंच आदि भी इससे अछूते नहीं। लेकिन क्या इन सभी में हम शिवाजी का सर्वांगपूर्ण चरित्र-चित्रण पाते है? शायद नहीं। विषय-वस्तु की मांग या फिर रचनाकार के व्यक्तिगत आग्रह के कारण शिवाजी का जो रूप हमारे सामने आता है वह अक्सर एकांगी ही अधिक लगता है। और जहां तक शिवाजी कि धार्मिक आस्था, विश्वास और भक्ति का सवाल है उसे अक्सर ही विकृत रूप में पेश किया जाता है। हिन्दू धर्म के तथाकथित संरक्षक भी डंके कि चोट पर…

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साहित्य की ऐसी शायद ही कोई विधा बची हो जिसमें शिवाजी के चरित्र पर कोई रचना न रची गयी हो। सिनेमा, रंगमंच आदि भी इससे अछूते नहीं।

लेकिन क्या इन सभी में हम शिवाजी का सर्वांगपूर्ण चरित्र-चित्रण पाते है? शायद नहीं। विषय-वस्तु की मांग या फिर रचनाकार के व्यक्तिगत आग्रह के कारण शिवाजी का जो रूप हमारे सामने आता है वह अक्सर एकांगी ही अधिक लगता है। और जहां तक शिवाजी कि धार्मिक आस्था, विश्वास और भक्ति का सवाल है उसे अक्सर ही विकृत रूप में पेश किया जाता है। हिन्दू धर्म के तथाकथित संरक्षक भी डंके कि चोट पर उन्हें एक हिन्दू धर्मी और मुसलमान विद्वेषी, गौ-ब्राह्मणों के रक्षक शासक के रूप में ही पेश करते है।

ऐसे समय में जबकि देश में धार्मिक कट्टरता का माहौल गरमा रहा है शिवाजी जैसे शासकों के चरित्र को सही रंग में पेश करना और उसका सकारात्मक विश्लेषण आवश्यक है।

इसी आवश्यकता को पूरा करती है यह पुस्तिका।

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